चंद्रयान कार्यक्रम की शुरुआत और उद्देश्य
Chandrayaan नाम — “चंद्र” यानी चाँद + “यान” यानी यान/यानत्र — भारत की चाँद की ओर वैज्ञानिक यात्रा को दर्शाता है। चंद्रयान कार्यक्रम, जिसे ISRO चला रहा है, मूल रूप से चाँद की सतह, उसकी खनिज संरचना, भू-भौतिक स्वरूप, जल/बर्फ की खोज, तथा चंद्रमा के भूविज्ञान (geology) एवं खनिज विज्ञान (mineralogy) का अध्ययन करने के लिए शुरू हुआ था। इसरो का मकसद चंद्रमा के रहस्यों को जानना, उसकी संरचना समझना, और भविष्य में संभव मानव मिशनों या नमूना-वापसी (sample-return) जैसी जटिल गतिविधियों के लिए आधार तैयार करना है।
अब तक 2003 से इस प्रयास की शुरुआत हुई, और यह कार्यक्रम आज भी सक्रिय है
शुरुआत: चंद्रयान-1 — प्रथम कदम
भारत का पहला चंद्र मिशन Chandrayaan-1 था, जिसे 22 अक्टूबर 2008 को लॉन्च किया गया। इस मिशन की रूप-रेखा ऑर्बिटर + एक इम्पैक्ट प्रॉब (Moon Impact Probe, MIP) की थी। ऑर्बिटर ने चंद्रमा की परिक्रमा की और MIP ने चंद्रमा की सतह पर “इम्पैक्ट” करते हुए जानकारी इकठ्ठा की।
इस मिशन के वैज्ञानिक उपकरणों में कई आधुनिक स्पेक्ट्रोमीटर, रडार, खनिज व रासायनिक विश्लेषण करने वाले उपकरण शामिल थे। उदाहरण के लिए, मून मिनरलोजी मैपर (M³), मिनी-SAR, SARA (Sub-keV Atom Reflecting Analyzer), इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोमीटर आदि।
Chandrayaan-1 ने चन्द्रमा का एक विस्तृत मैप तैयार किया — विभिन्न तरंगदैर्ध्य (इन्फ्रारेड, एक्स-रे, एवं अन्य) में — जिससे हमें चंद्रमा की सतह की संरचना, खनिजों, मिट्टी, और सतही बनावट के बारे में जानकारी मिली।
लेकिन सबसे बड़ी सफलता — और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की पहचान — थी: इस मिशन ने चंद्रमा पर पानी (water molecules / hydroxyl / ice) की मौजूदगी के ठोस प्रमाण दिए। इसके अलावा, इसने लावा-गुफाओं (lava tubes), चंद्र सतह की भू-भौतिक संरचनाओं, और संभवतः चंद्र गुफाओं, भूगतिशीलता व भू-विज्ञान से जुड़ी जानकारी दी।
इस तरह, Chandrayaan-1 ने भारत को चाँद पर पहुँचाया और पहली बार हमारे लिए चंद्र भू-विज्ञान, खनिज संरचना और जल की संभावना प्रस्तुत की — जो आगे के मिशनों की नींव बनी।
Chandrayaan-2: अगला प्रयास, नया कॉम्बिनेशन, और अनुभव
दूसरा मिशन Chandrayaan-2 था, जिसे 22 जुलाई 2019 को लॉन्च किया गया।
इस बार मिशन डिजाइन पहले से ज़्यादा महत्वाकांक्षी था: ऑर्बिटर + लैंडर + रोवर — यानी चंद्रमा की सतह पर नरम लैंडिंग + सतही एक्सप्लोरेशन + कक्षा से डेटा संग्रह, तीनों भूमिका। लैंडर का उद्देश्य था चंद्र सतह पर उतरना, जबकि रोवर सतह पर घूमकर मिट्टी, खनिज, पानी की खोज, भू-रासायनिक विश्लेषण करना।
लॉन्च के बाद ऑर्बिटर सफलतापूर्वक चंद्र कक्षा में पहुँचा और कई संवेदनशील डेटा लेने लगा। इसके साथ-साथ लैंडर/रोवर भी उतरने की तैयारी में थे।
लेकिन दुर्भाग्यवश, लैंडर का लैंडिंग प्रयास असफल रहा — लैंडर क्रैश हुआ। इसलिए रोवर सतह पर नहीं पहुँच पाया।
फिर भी, Chandrayaan-2 पूरी तरह निराशाजनक नहीं थी: ऑर्बिटर कक्षा में सक्रिय रहा, और उसने चंद्र सतह, भू-रासायनिक संरचना, पानी/बर्फ की संभावना आदि पर डेटा देना जारी रखा। इससे चंद्रिया ज्ञान और मजबूत हुआ।
इस मिशन ने दिखाया कि हमारे पास कक्षा (orbital) मिशन + सतही (landing/rover) विकल्प के लिए टेक्नोलॉजी है — भले लैंडिंग पूरी तरह सफल नहीं रही — और भविष्य के मिशनों के लिए महत्वपूर्ण सबक मिले।
Chandrayaan-3: सफलता, दक्षिण ध्रुव और नया इतिहास
तीसरा मिशन Chandrayaan-3 था, जिसे 14 जुलाई 2023 को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से लॉन्च किया गया।
इस मिशन में लैंडर (नाम: Vikram) और रोवर (नाम: Pragyan) था, और कक्षा मॉड्यूल — यानी अब तक की तुलना में मिशन डिजाइन सरल लेकिन सतही ऑपरेशन पर पूरा ध्यान था।
5 अगस्त 2023 को यान चंद्र कक्षा में पहुँचा, और 23 अगस्त 2023 की शाम 18:04 IST (12:33 UTC) पर लैंडर Vikram ने चंद्रमा की सतह पर नरम लैंडिंग सफलतापूर्वक की — वह भी चाँद के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र (south pole region) के निकट, लगभग 69° दक्षिण अक्षांश पर।
इस लैंडिंग ने भारत को उन चुनिंदा देशों में ला दिया जिसने चंद्रमा पर सफल सॉफ्ट-लैंडिंग की है (पहले: सोवियत, अमेरिका, चीन), और साथ ही भारत पहला देश बना जिसने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास लैंड किया।
रोवर Pragyan और लैंडर Vikram ने चंद्र सतह की मिट्टी, मिट्टी की बनावट, खनिज, सतही पर्यावरण, तापमान, और संभव जलीय संरचनाओं (अगर हों) का अध्ययन शुरू किया। चंद्र ध्रुवीय क्रेटर और आसपास की विशेषताएं उन क्षेत्रों में थीं जिन्हें पहले बहुत कम या कभी एक्सप्लोर नहीं किया गया था — इसलिए यह मिशन चंद्र भू-विज्ञान, पानी, बर्फ, सतही पर्यावरण आदि के अध्ययन में नया मोड़ था।
हालाँकि चंद्रमा की रात (lunar night) में तापमान अत्यंत गिर जाता है और लैंडर-रोवर के लिए मुश्किलें होती हैं। लैंडर को इस रात के लिए डिज़ाइन नहीं किया गया था, इसलिए लैंडिंग के करीब 12 दिन बाद लैंडर बंद कर दिया गया।
लेकिन फिर भी, Chandrayaan-3 भारत के लिए एक प्रमुख सफलता रही — जिसने दिखाया कि हमारा टेक्नोलॉजी सफाई के साथ काम करती है, और चंद्रमा के सबसे रहस्यमय हिस्सों में उतरना संभव है। इसने चंद्र अन्वेषण में हमारे आत्मविश्वास को और बढ़ाया।
Chandrayaan-4: भारत की अगली बड़ी छलांग – नमूना वापसी
अब आ रहा है अगले स्तर का चरण: Chandrayaan-4। इस मिशन को सरकार की ओर से मंजूरी मिल चुकी है, और इसे भारत का सबसे जटिल और महत्वाकांक्षी लूनर मिशन कहा जा रहा है।
मुख्य उद्देश्य है — चंद्र सतह से मिट्टी या चट्टान (moon regolith / lunar soil / rock) के नमूने (samples) लेकर उन्हें सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापिस लाना।
मिशन की रूप-रेखा (design): Chandrayaan-4 में कुल मिलाकर पाँच मॉड्यूल होंगे, जो पृथ्वी की कक्षा में और फिर चंद्र कक्षा में अलग-अलग सक्रिय होंगे। इसके लिए दो लॉन्च व्हीकल (लगभग 2 × LVM3 SC) इस्तेमाल होंगे।
चंद्र लैंडिंग साइट उन क्षेत्रों के पास तय की गई है जहाँ Chandrayaan-3 ने लैंड किया था — यानी लगभग उस इलाके में जिसे “Statio Shiv Shakti” कहा जाता है।
मिशन में जो कदम होंगे, वे काफी जटिल हैं: नरम लैंडिंग (soft landing), नमूना संग्रह (sample collection), नमूनों को कंटेनर में बंद करना (containerization), चंद्र सतह से उठकर (ascent) वापस कक्षा में आना, मॉड्यूल्स के बीच डॉकिंग/अनडॉकिंग, और फिर नमूनों को लेकर पृथ्वी की ओर रिटर्न (re-entry + Earth return)।
भारत की नियत योजना है कि Chandrayaan-4 को 2028 के आस-पास लॉन्च किया जाए। हालाँकि कुछ रिपोर्ट्स 2027 की भी बात करती हैं, लेकिन 2028 सबसे विश्वसनीय लक्ष्य है।
इसके लिए इसरो ने आंतरिक तैयारी शुरू कर दी है — नमूनों को पृथ्वी पर सुरक्षित पहुंचाने के लिए एक विशेष संग्रह सुविधा (curation facility / clean room) विकसित की जा रही है, ताकि नमूनों की शुद्धता (pristine condition) बनी रहे।
अगर यह मिशन सफल हुआ, तो भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा — जिन्होंने चंद्रमा से नमूना वापस लिया है। इसके वैज्ञानिक महत्व के साथ-साथ प्रतिष्ठात्मक महत्व भी होगा।
क्यों ये मिशन महत्वपूर्ण हैं – वैज्ञानिक और राष्ट्रीय दृष्टिकोण
चंद्रयान कार्यक्रम केवल “यान भेजना” नहीं — बल्कि हर मिशन पहले के अनुभव, जानकारी और चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ने की रणनीति है।
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Chandrayaan-1 ने चंद्र सतह का मानचित्रण और पानी की खोज करके चंद्र भू-विज्ञान और पानी/बर्फ संबंधी संभावनाओं की नींव रखी।
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Chandrayaan-2 ने Orbiter + Lander + Rover कॉम्बिनेशन की परिकल्पना की — भले लैंडिंग ना सफल हो — लेकिन इसके द्वारा चाही गई तकनीकी तैयारियों व पेलोड विकल्पों की समझ मिली।
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Chandrayaan-3 ने देखा कि नरम लैंडिंग और रोवर एक्सप्लोरेशन संभव है — और चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की ओर बढ़कर नई जमीन बनाई।
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Chandrayaan-4, अगर सफल हुआ, तो यह वैज्ञानिक दृष्टि से मील का पत्थर होगा: चंद्र मिट्टी/चट्टान (regolith / rock) का विश्लेषण, यूरो-अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिकों को नमूना उपलब्ध करना, और भविष्य के मानव मिशनों या बुनियादी संरचनाओं (moon base, lunar resources) के लिए आधार तैयार करना।
इसके अलावा, इसरो के लिए यह मिशन एक टेक्नोलॉजिक अभ्यास होगा — डॉकिंग, ascent, re-entry, sample containment, complex module operations आदि — जो मानवयुक्त मिशनों या अन्य भविष्य के चंद्र या अंतरिक्ष अभियानों की तैयारी में सहायक होंगे।

























